नगर के प्रसिद्ध राघव मंदिर परिसर में मध्यरात्रि 12:00 बजे होलिका दहन का पावन आयोजन बड़ी धूमधाम और वैदिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम बैलाडीला देवस्थान समिति के तत्वावधान में आयोजित किया गया, जिसमें सैकड़ों की संख्या में स्थानीय श्रद्धालु, परिवारजन और भक्तजन उपस्थित रहे।
होलिका दहन का यह पर्व हिंदू धर्म में बुराई पर अच्छाई की विजय, अहंकार पर भक्ति की जीत और अधर्म के अंत का प्रतीक माना जाता है। पुराणों में वर्णित प्रसिद्ध कथा के अनुसार, असुर राजा हिरण्यकश्यप स्वयं को ईश्वर घोषित कर पूजा की मांग करता था। उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका (जिसे अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था) को प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने को कहा। लेकिन भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका स्वयं भस्म हो गई। इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर होलिका दहन किया जाता है, जो नकारात्मकता, अहंकार और बुराइयों को जलाकर सत्य, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का संदेश देता है।
राघव मंदिर में भी इसी परंपरा को निभाते हुए श्रद्धालुओं ने वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना और हवन के बाद शुभ मुहूर्त में पवित्र अग्नि प्रज्वलित की। सभी ने होलिका की परिक्रमा की और परिवार की सुख-समृद्धि, नगर की शांति तथा सामाजिक एकता की कामना की। मंदिर परिसर जयकारों, भक्ति भजनों और उल्लास से गूंज उठा, जिसने वातावरण को और भी दिव्य बना दिया।
कार्यक्रम में उपस्थित समिति के सचिव ए के सिंह जी और प्रधान पुजारी सतेंद्र प्रसाद शुक्ला जी ने सभी श्रद्धालुओं का हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “होलिका दहन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सनातन संस्कृति, आस्था और एकजुटता का जीवंत प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि भक्ति और सत्य के सामने कोई भी बुराई टिक नहीं सकती। ऐसे धार्मिक आयोजनों से समाज में भाईचारा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना मजबूत होती है। मैं सभी सनातनी भाइयों-बहनों से अपील करता हूं कि आगे भी इसी उत्साह से ऐसे पवित्र आयोजनों में भाग लें।”
उन्होंने यह भी सूचित किया कि 4 मार्च को इसी राघव मंदिर परिसर में होली उत्सव (रंगोत्सव) पारंपरिक रूप से मनाया जाएगा। इस दौरान नगरवासी एक साथ मिलकर रंगों की मस्ती में डूबेंगे, आपसी वैमनस्य भुलाकर प्रेम और सौहार्द का संदेश फैलाएंगे। होली का यह पर्व न केवल रंगों का उत्सव है, बल्कि यह जीवन में नए रंग भरने, पुरानी कटुता को भुलाने और एक-दूसरे के प्रति प्रेम बढ़ाने का अवसर भी प्रदान करता है।
कार्यक्रम के समापन पर सभी ने एक-दूसरे को होली की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाएं दीं और सामूहिक रूप से सनातन संस्कृति की रक्षा एवं सामाजिक एकता के संकल्प को दोहराया।
यह आयोजन न केवल धार्मिक था, बल्कि सामुदायिक एकता का भी उत्कृष्ट उदाहरण साबित हुआ, जो छत्तीसगढ़ के इस क्षेत्र में सनातनी परंपराओं की जीवंतता को दर्शाता है।

