गाजियाबाद।
कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक हलचल सी मची हुई है। कथित तौर पर देह व्यापार नेटवर्क को लेकर यह हलचल लगातार बढ़ती जा रही है। सूचना मिली, पुलिस ने होटल पर छापा मारा, कुछ लोगों को पकड़ा और होटल से जुड़े व्यक्तियों से पूछताछ की।
लेकिन अब एक के बाद एक नई कहानी निकलकर सामने आ रही है। जैसा कि अक्सर होता आया है—जैसे ही कोई अपराध सामने आता है, कुछ प्रभावशाली लोग अपना निजी बदला लेने के लिए निर्दोष व्यक्तियों का नाम उसमें फंसाना शुरू कर देते हैं। आरोप यह भी है कि कई बार यह पूरा षड्यंत्र कैसे रचा जाता है, ताकि एक बेगुनाह व्यक्ति को अपराधी बना दिया जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है—
की आख़िर कौन है वह, प्रभावशाली और भाजपा विरोधी व्यक्ति जिसके इशारे पर न सिर्फ निर्दोष कसाना की फोटो का इस्तेमाल बगैर उनकी परमिशन के किया जा रहा है
बल्कि सोशल मीडिया पर लगातार खबरें चलाकर मीडिया ट्रायल के द्वारा निर्दोष कसाना को दोषी साबित करना चाहता है?
सवाल यह भी है कि इतने बड़े-बड़े लोगों के नाम सामने आने के बाद भी जिन पर पुलिस कार्रवाई नहीं करती, वहीं महज किसी एक आरोपी द्वारा नाम ले लेने भर से पुलिस एक बेगुनाह व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर देती है।
समझने की जरूरत इस बात की है कि जब यह कथित अपराध हो रहा था, तब जिसे अपराधी बनाया जा रहा है वह उस समय कहां था? क्या कोई सुराग, कोई सबूत या कोई तथ्य है जो उसे अपराधी साबित करता हो?
जवाब है—कुछ भी नहीं।
मात्र इतना हुआ कि किसी एक व्यक्ति ने उसका नाम ले लिया और पुलिस ने आनन-फानन में एफआईआर दर्ज कर दी।
आखिर पुलिस को निर्दोष कसाना के खिलाफ ऐसा क्या मिला कि उनके नाम पर एफआईआर दर्ज कर दी गई? क्योंकि कानून के अनुसार एफआईआर तब दर्ज होती है जब आरोपी के खिलाफ कोई आधार या तथ्य मौजूद हो।
लेकिन यहां तो मामला ही कुछ और नजर आता है—
न कोई फोन लोकेशन,
न कोई प्रत्यक्ष सबूत,
न उस समय मौके पर मौजूद होने का प्रमाण,
और न ही अपराध में किसी भी प्रकार की संलिप्तता का कोई स्पष्ट सुराग।
ऐसे में केवल कुछ प्रभावशाली लोगों के दबाव में आकर एक शरीफ व्यक्ति को फंसा देना आखिर कहां तक न्यायसंगत है?
आखिर किस तरह से एक व्यक्ति—निर्दोष कसाना—को फंसाने के लिए राजनीति और कानून का सहारा लिया गया?
कौशांबी थाना क्षेत्र में सामने आए कथित सेक्स रैकेट मामले के बाद जहां पुलिस की कार्रवाई सुर्खियों में रही, वहीं अब इस पूरे मामले को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कुछ स्थानों पर निर्दोष कसाना का नाम इस प्रकरण से जोड़कर चर्चा की जा रही है, जिस पर सवाल उठने लगे हैं।
मामले से जुड़े लोगों का कहना है कि निर्दोष कसाना का इस घटना से कोई लेना-देना नहीं है। इसके बावजूद उनका नाम उछालकर उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।
पुलिस कार्रवाई में क्या सामने आया
पुलिस के अनुसार 11 फरवरी 2026 को कौशांबी थाना क्षेत्र के एक होटल में छापेमारी की गई थी। इस कार्रवाई के दौरान कथित रूप से चल रही अनैतिक गतिविधियों का खुलासा हुआ।
पुलिस ने मौके से 11 महिलाओं को रेस्क्यू किया और तीन लोगों को गिरफ्तार किया। इस मामले में अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम, 1956 की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया।
एफआईआर के अनुसार इस मामले में अंकित चौहान, सुनील और होटल मैनेजर राहुल शर्मा के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस रिकॉर्ड में फिलहाल इन्हीं व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई दर्ज बताई गई है।
बिना नाम के किया बदनाम
निर्दोष कसाना से जुड़े लोगों का कहना है कि कुछ लोग बिना किसी ठोस प्रमाण के उनका नाम इस मामले से जोड़कर उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि घटना के समय निर्दोष कसाना मौके पर मौजूद नहीं थे।
साथ ही अब तक जांच में ऐसा कोई व्हाट्सऐप चैट या अन्य डिजिटल सबूत सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो सके कि इस घटना में उनका किसी भी तरह का हाथ था।
अग्रिम जमानत भी मिल चुकी
मामले से जुड़े लोगों के अनुसार उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अदालत ने 25 फरवरी 2026 को निर्दोष कसाना को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) प्रदान कर दी है। इसे उनके पक्ष में एक महत्वपूर्ण कानूनी राहत माना जा रहा है।
सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का आरोप
निर्दोष कसाना से जुड़े लोगों का कहना है कि वे लंबे समय से समाज में सक्रिय रहे हैं और उनकी एक साफ-सुथरी छवि रही है। ऐसे में बिना किसी प्रमाण के उनका नाम इस तरह के संवेदनशील मामले से जोड़ना गलत है।
उनका कहना है कि इस तरह की खबरें और अफवाहें न केवल किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाती हैं बल्कि उसके परिवार और सामाजिक जीवन पर भी गहरा असर डालती हैं।
जिम्मेदार रिपोर्टिंग की मांग
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने मीडिया से भी जिम्मेदारी के साथ खबरें प्रकाशित करने की अपील की है। उनका कहना है कि किसी भी व्यक्ति का नाम तभी सार्वजनिक किया जाना चाहिए जब उसके खिलाफ आधिकारिक रूप से ठोस प्रमाण या आरोप हों।
लोगों का मानना है कि जांच पूरी होने के बाद सच्चाई सामने आएगी और यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि कहीं किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक रूप से इस मामले में घसीटा तो नहीं जा रहा।

