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Home » Blog » संविदा और असंगठित श्रमिकों के अधिकारों को लेकर PMO में शिकायत, सामाजिक कार्यकर्ता ने रखे बड़े सुझाव
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संविदा और असंगठित श्रमिकों के अधिकारों को लेकर PMO में शिकायत, सामाजिक कार्यकर्ता ने रखे बड़े सुझाव

Pushp Naman Srivastava
Last updated: April 18, 2026 7:57 pm
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  • श्रमिकों के अधिकारों को लेकर PMO तक पहुंची आवाज, बड़े सुधारों की मांग
  • कानून और जमीनी हकीकत के बीच खाई
  • चार बड़ी समस्याएं जो बनी हुई हैं चुनौती
  • तीन बड़े सुझाव जो बदल सकते हैं तस्वीर
  • ‘गुड गवर्नेंस’ की दिशा में बड़ा कदम
  • PMO के फैसले पर टिकी नजरें
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श्रमिकों के अधिकारों को लेकर PMO तक पहुंची आवाज, बड़े सुधारों की मांग

नई दिल्ली, 18 अप्रैल 2026 — भारत के विकास की रीढ़ माने जाने वाले करोड़ों संविदा (Contract) और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के भविष्य को लेकर एक बड़ी पहल सामने आई है। सामाजिक कार्यकर्ता प्रवेश कुमार जोशी ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में एक आधिकारिक शिकायत (रजिस्ट्रेशन नंबर: PMOPG/E/2026/0065346) दर्ज कराकर केंद्र सरकार का ध्यान श्रमिक वर्ग की जमीनी समस्याओं की ओर आकर्षित किया है।

Contents
श्रमिकों के अधिकारों को लेकर PMO तक पहुंची आवाज, बड़े सुधारों की मांगकानून और जमीनी हकीकत के बीच खाईचार बड़ी समस्याएं जो बनी हुई हैं चुनौतीतीन बड़े सुझाव जो बदल सकते हैं तस्वीर‘गुड गवर्नेंस’ की दिशा में बड़ा कदमPMO के फैसले पर टिकी नजरेंAbout The AuthorPushp Naman Srivastava

जोशी द्वारा उठाया गया यह मुद्दा Prime Minister’s Office के समक्ष विचाराधीन है और इससे देश में श्रम सुधारों को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

कानून और जमीनी हकीकत के बीच खाई

अपने पत्र में जोशी ने कहा कि सरकार द्वारा लागू किए गए Labour Codes निश्चित रूप से एक आधुनिक और सराहनीय कदम हैं, लेकिन इनका लाभ अभी तक अंतिम पायदान पर खड़े श्रमिकों तक नहीं पहुंच पा रहा है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि कागजों पर बने नियम और वास्तविक स्थिति के बीच बड़ा अंतर है, जिसके कारण श्रमिकों को उनका हक नहीं मिल पा रहा।

चार बड़ी समस्याएं जो बनी हुई हैं चुनौती

शिकायत में श्रमिकों से जुड़ी चार गंभीर समस्याओं को प्रमुखता से उठाया गया है:

1. वेतन में भारी विसंगति
कई कंपनियां स्किल्ड वर्कर्स को अनस्किल्ड बताकर कम वेतन देती हैं, यहां तक कि सरकारी न्यूनतम वेतन से भी कम भुगतान किया जा रहा है।

2. श्रम शोषण
श्रमिकों से 8 घंटे से अधिक काम लिया जाता है, लेकिन ओवरटाइम का भुगतान नहीं किया जाता, जो नियमों का खुला उल्लंघन है।

3. सामाजिक सुरक्षा का अभाव
कई कंपनियां कर्मचारियों का PF और ग्रेच्युटी जमा करने में लापरवाही बरतती हैं, जिससे उनका भविष्य असुरक्षित हो जाता है।

4. सुरक्षा का संकट
जोखिम भरे कार्यों में लगे श्रमिकों के पास पर्याप्त बीमा कवर नहीं होता, जिससे दुर्घटना की स्थिति में परिवार आर्थिक संकट में आ जाता है।

तीन बड़े सुझाव जो बदल सकते हैं तस्वीर

प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग करते हुए जोशी ने तीन महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं:

1. स्थानीय भाषा में जानकारी अनिवार्य
सभी कंपनियों और निर्माण स्थलों पर श्रम कानूनों और योजनाओं की जानकारी स्थानीय भाषा में बड़े बोर्ड पर प्रदर्शित की जाए।

2. WhatsApp आधारित शिकायत प्रणाली
WhatsApp के माध्यम से एक सरल और तेज शिकायत निवारण प्रणाली शुरू की जाए, जिससे श्रमिक आसानी से अपनी समस्याएं दर्ज कर सकें।

3. ₹25 लाख का अनिवार्य बीमा
हर श्रमिक के लिए कम से कम 25 लाख रुपये का एक्सीडेंटल या टर्म इंश्योरेंस अनिवार्य किया जाए, ताकि किसी दुर्घटना में परिवार को आर्थिक सहारा मिल सके।

‘गुड गवर्नेंस’ की दिशा में बड़ा कदम

जोशी ने अपने पत्र में कहा:

“हमारे कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स के अधिकारों को मजबूत करने से न सिर्फ हमारी आधी आबादी सशक्त होगी, बल्कि सुशासन (Good Governance) के क्षेत्र में भारत एक वैश्विक उदाहरण बन सकता है।”

PMO के फैसले पर टिकी नजरें

यह शिकायत 18 अप्रैल 2026 को दर्ज की जा चुकी है और वर्तमान में Prime Minister’s Office के विचाराधीन है। यदि सरकार इन सुझावों को स्वीकार करती है, तो यह देश के औद्योगिक और श्रम ढांचे में बड़े बदलाव की शुरुआत साबित हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि Good Governance और पारदर्शिता के इस दौर में श्रमिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना ही सबसे बड़ा सुधार होगा।

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