चंडीगढ़ | Punjab and Haryana High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी विवाद के दौरान “जाकर मर जाओ” जैसे शब्द कह देना अपने-आप में आत्महत्या के लिए उकसाने (abetment of suicide) का अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि आरोपी की स्पष्ट मंशा थी और उसके कथन का आत्महत्या से सीधा संबंध था।
22 साल पुराने मामले में आया फैसला
यह मामला हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के एक गांव से जुड़ा था, जहां एक किशोरी की मौत के बाद उसके पिता और सौतेली मां के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। शिकायत के आधार पर 12 जुलाई 2003 को एफआईआर दर्ज की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने 2004 में दोनों को दोषी मानते हुए सात-सात साल की सजा सुनाई थी।
हालांकि अपील की सुनवाई के दौरान वर्ष 2022 में पिता की मृत्यु हो गई, जिसके बाद मामला केवल सौतेली मां के खिलाफ जारी रहा।
हाई कोर्ट ने सजा रद्द कर महिला को किया बरी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रुपिंदरजीत चहल की पीठ ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और महिला को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि किशोरी की मौत वास्तव में आत्महत्या थी या उसमें सौतेली मां की कोई भूमिका थी।
अदालत ने क्या कहा
हाई कोर्ट ने कहा कि अगर मान भी लिया जाए कि आरोपी ने “जाकर मर जाओ” जैसे शब्द कहे थे, तो भी यह अधिकतम एक आकस्मिक या भावनात्मक टिप्पणी हो सकती है।
अदालत के अनुसार आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध सिद्ध करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी की स्पष्ट मंशा (mens rea) थी और उसके व्यवहार तथा आत्महत्या के बीच सीधा संबंध था।
सबूतों में भी मिली कई कमियां
अदालत ने यह भी पाया कि मामले में कई महत्वपूर्ण साक्ष्य मौजूद नहीं थे। किशोरी के शव का पोस्टमार्टम नहीं कराया गया था और बाद में जांच के लिए भेजी गई राख और हड्डियों में किसी प्रकार का जहर भी नहीं पाया गया। इससे मौत के वास्तविक कारण पर संदेह बना रहा।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी हवाला
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि झगड़े के दौरान बोले गए “जाओ और मर जाओ” जैसे शब्द तब तक आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में नहीं आते, जब तक इसके पीछे स्पष्ट इरादा और सीधा संबंध साबित न हो

