उत्तराखंड में यूसीसी के तहत सख्त नियम: लिव-इन में रहने पर अब सख्ती, शादीशुदा होकर छिपाने पर होगी सजा
देहरादून, अगस्त 2025 – उत्तराखंड सरकार ने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) के तहत लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े नियमों को और कठोर बना दिया है। नए कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति शादीशुदा होते हुए भी अपनी वैवाहिक स्थिति छिपाकर लिव-इन में रहता है, तो उसे धोखाधड़ी का दोषी मानते हुए कड़ी सजा दी जा सकेगी।
इसके अलावा, अब हर लिव-इन जोड़े को एक महीने के भीतर अपने रिश्ते का पंजीकरण कराना अनिवार्य कर दिया गया है। यह कदम महिलाओं और बच्चों को कानूनी सुरक्षा देने, पारदर्शिता बनाए रखने और सामाजिक व्यवस्था को सशक्त करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
🔍 क्या कहते हैं नए नियम?
लिव-इन पंजीकरण जरूरी
लिव-इन रिश्ते में रहने वाले सभी जोड़ों को 30 दिनों के भीतर जिला रजिस्ट्रार के पास रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा।देर या गलत जानकारी पर दंड
पंजीकरण में देरी करने पर: 3 महीने तक की जेल, या ₹10,000 तक जुर्माना, या दोनों।
झूठी जानकारी देने पर: 6 महीने की जेल या ₹25,000 जुर्माना, या दोनों।
शादीशुदा होकर लिव-इन में रहना अपराध
यदि कोई व्यक्ति विवाहित होने की सच्चाई छिपाकर किसी लिव-इन रिश्ते में रहता है, तो यह धोखाधड़ी मानी जाएगी और उस पर कानूनी कार्रवाई होगी।मकान मालिकों की जिम्मेदारी
मकान किराए पर देने से पहले मकान मालिक को यह सुनिश्चित करना होगा कि लिव-इन जोड़ा रजिस्टर्ड है। नियम का उल्लंघन करने पर ₹20,000 तक जुर्माना लगाया जा सकता है।
👶 बच्चों को मिलेगा कानूनी अधिकार
राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि लिव-इन संबंधों से जन्मे बच्चे “वैध” माने जाएंगे। ऐसे बच्चों को न केवल उत्तराधिकार का अधिकार मिलेगा, बल्कि उन्हें सभी कानूनी सुरक्षा भी प्रदान की जाएगी।
📌 क्यों जरूरी थे ये बदलाव?
उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जिसने UCC को लागू किया। सरकार का मानना है कि बदलते समय में रिश्तों के स्वरूप में आए बदलाव को देखते हुए स्पष्ट और सख्त दिशा-निर्देश जरूरी हैं।
इन कानूनों का मुख्य उद्देश्य है:
महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना
फर्जी रिश्तों और धोखाधड़ी पर रोक लगाना
सामाजिक और कानूनी पारदर्शिता को बढ़ावा देना
📊 अब तक क्या हुआ?
UCC लागू होने के 110 दिनों में केवल 28 लिव-इन रिश्तों का रजिस्ट्रेशन हुआ है।
अब सरकार ने वार्ड स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया है।
अभी तक किसी पर सजा नहीं दी गई, लेकिन अब उल्लंघन करने वालों पर कड़ाई बरती जाएगी।
⚖️ अदालत की भूमिका
यूसीसी को लेकर कई लोगों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की हैं, जिनमें निजता के अधिकार का मुद्दा उठाया गया है।
हालांकि, अदालत ने यह साफ किया है कि यदि कोई सार्वजनिक रूप से साथ रह रहा है, तो उसका पंजीकरण कराना निजता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
केंद्र सरकार को भी इस मामले में तीन सप्ताह में जवाब देने का निर्देश दिया गया है।
🔚 निष्कर्ष
उत्तराखंड की यह पहल एक महत्वपूर्ण सामाजिक और कानूनी बदलाव की ओर इशारा करती है।
इस कानून से न केवल रिश्तों में पारदर्शिता आएगी, बल्कि महिलाओं और बच्चों को संविधानिक सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकेगी।

