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Home » Blog » कलम को बेड़ियों में मत जकड़ो, पत्रकारिता का धर्म है सच बोलना, न कि सत्ता के आगे नतमस्तक होना
Editorial

कलम को बेड़ियों में मत जकड़ो, पत्रकारिता का धर्म है सच बोलना, न कि सत्ता के आगे नतमस्तक होना

Tripty Srivastava
Last updated: September 6, 2025 3:02 pm
Tripty Srivastava
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फतेहपुर जनपद की प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों सवालों के घेरे में है। थानों और चौकियों में न्याय की उम्मीद लिए पहुंचने वाला आम आदमी जब निराश होकर लौटता है, तो यह केवल प्रशासन की विफलता नहीं होती, बल्कि लोकतंत्र पर गहरा प्रहार होता है। जनता की आवाज़ को दबाना और मामूली मामलों में सौदेबाज़ी करना उस मानसिकता को दर्शाता है, जो शासन को “सेवा” से “व्यापार” में बदल देता है।

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About The AuthorTripty Srivastava

लेकिन इससे भी बड़ी चिंता का विषय है—पत्रकारिता का मौन। आज के हालात यह दर्शा रहे हैं कि कई पत्रकार साथी अपनी कलम को सीमित कर चुके हैं। जहां कलम से सत्ता की नाकामी और अत्याचार उजागर होने चाहिए थे, वहीं कलम अब प्रशासन की “साफ-सुथरी तस्वीर” बनाने में व्यस्त है। प्रश्न यह है कि क्या पत्रकारिता अब इतनी मजबूर हो गई है कि जनता का शोषण देखकर भी खामोश रहे?

इतिहास से सबक

यह धरती वही है, जहां विद्यार्थी जी जैसे निर्भीक पत्रकार हुए। अंग्रेजों की कठोर नीतियों के बीच भी उन्होंने कलम से अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि पत्रकारिता केवल खबरें लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का सशक्त हथियार है। यदि उस दौर में कलमकार झुक जाते, तो शायद स्वतंत्रता का संघर्ष इतनी मजबूती से आगे नहीं बढ़ पाता। आज जब प्रशासनिक तानाशाही और भ्रष्टाचार के किस्से हर गांव-गली में सुनाई देते हैं, तब पत्रकारिता का झुकना अंग्रेजी हुकूमत से भी ज्यादा भयावह परिदृश्य की ओर संकेत करता है।

पत्रकार की गिरती साख

थानों–चौकियों की चौखट पर बैठे कुछ पत्रकार जब चंद पैसों या सुविधाओं के लिए कलम को गिरवी रख देते हैं, तो समाज का भरोसा डगमगाने लगता है। यही वजह है कि आज पुलिसकर्मी तक पत्रकारों का मज़ाक उड़ाने लगे हैं। उन्हें लगता है कि जो कलम कभी उनके खिलाफ खड़ी होती थी, अब वही उनके इशारे पर चल रही है। यह स्थिति न केवल निंदनीय है बल्कि पत्रकारिता के अस्तित्व के लिए भी घातक है।

एकजुटता ही ताकत है

आज सबसे बड़ी जरूरत है कि पत्रकार अपने संगठन, धड़ेबाज़ी और व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर एकजुट हों। जब किसी साथी पर संकट आए तो यह न देखा जाए कि वह किस संगठन से जुड़ा है, बल्कि यह याद रखा जाए कि वह सबसे पहले पत्रकार है। यदि हम एक-दूसरे की गलतियों पर ही फोकस करते रहेंगे और एकजुट नहीं होंगे, तो प्रशासनिक तंत्र हमारी कमजोरी का फायदा उठाता रहेगा।

कलम को नई ऊर्जा देने का समय

पत्रकारिता कोई साधारण पेशा नहीं, यह लोकतंत्र की आत्मा है। पत्रकार का धर्म है सच बोलना और जनता की पीड़ा को सामने लाना। यदि कलम बेड़ियों में जकड़ी रही, तो आने वाले समय में न समाज हमें सम्मान देगा और न ही इतिहास हमें माफ करेगा।

आज जरूरत है आत्ममंथन की —

क्या हम केवल प्रशासन की तालियों के लिए लिख रहे हैं या जनता की पीड़ा के लिए?

क्या हमारी कलम से सच्चाई निकल रही है या सजावटी शब्द?

क्या हम विद्यार्थी जी की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं या कलम की ताकत को बेच रहे हैं?

पत्रकार समाज को अब निर्णय लेना होगा। या तो कलम को बेड़ियों से मुक्त करके सच की ताकत बनें, या फिर इतिहास के पन्नों में केवल “कमजोर और बंधक पत्रकार” के रूप में दर्ज हो जाएं।

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