शिमला: मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि हाल ही में राज्य के वित्तीय प्रबंधन और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। एक ओर जहां प्रदेश के बजट का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा वेतन और पैंशन पर खर्च हो रहा है, वहीं दूसरी ओर अदालती फैसलों के चलते वित्तीय बोझ लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2003 में तत्कालीन सरकार ने यह तय किया था कि कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को वरिष्ठता और वेतनवृद्धि का लाभ नहीं मिलेगा, लेकिन लगभग दो दशक बाद न्यायालय ने ऐसे वित्तीय लाभ देने का फैसला सुनाया है, जिनका प्रावधान भर्ती नियमों में न तब था और न ही आज है। इस तरह के फैसलों से राज्य का वित्तीय संतुलन गड़बड़ा रहा है। कर्मचारियों के हित जरूरी हैं, लेकिन इसके साथ ही प्रदेश के व्यापक वित्तीय हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने यह बात एचपीएनएलयू के दीक्षांत समारोह के बाद मीडिया में कही।
उन्होंने कहा कि इसके अलावा, प्रशासनिक और व्यवस्था से जुड़ी अन्य चुनौतियां भी सामने आई हैं। हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में समतल भूमि या मैदानों का अभाव है, जिसके चलते स्कूलों और सामुदायिक मैदानों का सांझा उपयोग किया जाता है। लेकिन ऐसा पहली बार देखने को मिला जब आजादी के लगभग 80 वर्षों बाद, प्रदेश सरकार को स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए 5 लाख रुपए की कॉस्ट चुकाकर मैदान का इस्तेमाल करना पड़ा, क्योंकि उच्च न्यायालय ने इसी शर्त पर मैदान की अनुमति दी थी।
उन्होंने कहा कि आजादी के इतने लंबे समय बाद भी यदि किसी राज्य को राष्ट्रीय पर्व मनाने के लिए अदालती फैसलों और शर्तों का सहारा लेना पड़े, तो इसे न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। समय की मांग है कि कर्मचारियों के अधिकारों, वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक सुगमता के बीच एक बेहतर संतुलन बनाया जाए ताकि राज्य का विकास सुचारू रूप से आगे बढ़ सके।

