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Home » Blog » एनएमडीसी स्लरी पाइपलाइन (भाग-2): नवरत्न का ‘अहंकार’ बनाम संविधान का वादा — क्या पैसों की चमक तले दब जाएगा गीदम के मासूम की मौत का इंसाफ?
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एनएमडीसी स्लरी पाइपलाइन (भाग-2): नवरत्न का ‘अहंकार’ बनाम संविधान का वादा — क्या पैसों की चमक तले दब जाएगा गीदम के मासूम की मौत का इंसाफ?

TRIPTY SRIVASTAVA
Last updated: July 31, 2026 3:31 pm
TRIPTY SRIVASTAVA
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दंतेवाड़ा | बचेली से नगरनार तक ₹3,500 करोड़ की लागत से बिछ रही एनएमडीसी की स्लरी पाइपलाइन परियोजना को “विकास” का नाम दिया गया है। लेकिन हकीकत में यह परियोजना बस्तर के ग्रामीणों के आंसुओं और एक मासूम के खून से लिखी जा रही है।

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About The AuthorTRIPTY SRIVASTAVA

पार्ट-1 में हमने दिखाया था कि कैसे मानसून में प्रतिबंध के बावजूद 10-10 फीट गहरे गड्ढे बिना बैरिकेडिंग के छोड़े जा रहे हैं। पार्ट-2 में वह सच्चाई है जो किसी भी “नवरत्न” कंपनी के दावों की पोल खोलती है।

1. 28 जुलाई 2025: वादों के झूठ में दफन हुआ एक मासूम

गीदम ब्लॉक के हाउरनार गांव में पाइपलाइन खुदाई के कारण बना पानी से भरा गड्ढा मौत का कुआं बन गया। एक ही परिवार के भाई-बहन उसमें डूब गए। ग्रामीणों ने बहन को तो बचा लिया, लेकिन मासूम भाई ने मौके पर दम तोड़ दिया।

हादसे के बाद एनएमडीसी और ठेकेदार कंपनी एलएंडटी के अधिकारियों ने पीड़ित परिवार को 2 बड़े वादे किए थे:
– आश्रित को स्थायी नौकरी
– उचित मुआवजा

लेकिन मामला ठंडा होते ही दोनों वादे कागज के टुकड़े बन गए। चंद रुपयों की “सहानुभूति राशि” फेंककर एलएंडटी ने पल्ला झाड़ लिया।

2. संविधान का अनुच्छेद 21 बनाम कॉरपोरेट लापरवाही

भारत का संविधान कहता है:

अनुच्छेद 21: “किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि “जीवन का अधिकार” सिर्फ सांस लेने तक सीमित नहीं है, इसमें “गरिमा के साथ जीने का अधिकार” और “सुरक्षित माहौल” भी शामिल है।

लेकिन हाउरनार में क्या हुआ?

– सार्वजनिक भूमि पर बिना बैरिकेडिंग, बिना चेतावनी बोर्ड के 10 फीट गहरे गड्ढे = सीधे तौर पर आपराधिक लापरवाही IPC 304A
– हादसे के बाद भी सुरक्षा ऑडिट नहीं = जीवन के अधिकार का उल्लंघन
– वादा करके मुकर जाना = विश्वासघात और शोषण

क्या एक नवरत्न कंपनी संविधान से ऊपर है?

3. 30 KM का सफर और टूटती “बुढ़ापे की लाठी”

आज उस मासूम की मां, श्रीमती गंगा ठाकुर, दूसरों के घर बर्तन-झाड़ू करके 2 बेटियों का पेट पाल रही हैं। न्याय के लिए उन्हें हर तारीख में 30 KM दूर अदालत के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

लाचार मां का कहना है”हमारे पास न गाड़ी है न बड़े वकील। बस उम्मीद है कि कानून अमीर-गरीब एक जैसा देखेगा।” — गंगा ठाकुर

एक तरफ अरबों का बजट और प्रशासनिक संरक्षण वाली कंपनी है। दूसरी तरफ एक लाचार मां। क्या संविधान के अनुच्छेद 14 “कानून के समक्ष समानता” का मतलब सिर्फ किताबों तक रह गया है?

4. तीन तीखे सवाल: जवाब दे एनएमडीसी और जिला प्रशासन

1. जवाबदेही कहां है? एलएंडटी ने स्थायी नौकरी और मुआवजे का वादा क्यों नहीं निभाया? एनएमडीसी ने ठेकेदार पर कार्रवाई क्यों नहीं की?
2. सुरक्षा कहां है? पिछले साल मौत के बाद भी इस साल फिर बिना बैरिकेडिंग गड्ढे क्यों? क्या पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और फैक्ट्री एक्ट कागज के लिए हैं?
3. ब्लैकलिस्ट क्यों नहीं? आपराधिक लापरवाही के बाद भी एलएंडटी को काम की छूट किसके इशारे पर मिली? क्या अनुच्छेद 39 में लिखा “राज्य कमजोरों के शोषण से रक्षा करेगा” सिर्फ भाषण है?

5. यह सिर्फ मुआवजे की लड़ाई नहीं, व्यवस्था की लड़ाई है

यह मामला सिर्फ एक मां की नौकरी या पैसे का नहीं है। यह उस सोच के खिलाफ है जहां “विकास” के नाम पर गरीब, आदिवासी और कमजोर की जान सस्ती हो जाती है।

न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है। संविधान की प्रस्तावना में लिखा “सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय” का वादा तब तक झूठा है जब तक श्रीमती गंगा ठाकुर को उनका हक नहीं मिलता।

अब गेंद एनएमडीसी प्रबंधन और दंतेवाड़ा प्रशासन के पाले में है। क्या वो नवरत्न कंपनी के रसूख के आगे झुकेंगे, या संविधान के आगे सिर?

क्या कानून इस मां के आंसुओं का हिसाब लेगा, या पैसों की चमक तले इंसाफ दब जाएगा?

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