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पंजाबराज्य

पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, 14,191 करोड़ के DA बकाये पर हाईकोर्ट के आदेश को दी चुनौती

TRIPTY SRIVASTAVA
Last updated: September 2, 2026 10:20 am
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नई दिल्ली: पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें राज्य के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के महंगाई भत्ते और महंगाई राहत के सभी बकाया भुगतान दो हफ़्ते के अंदर करने को कहा गया था. राज्य सरकार का तर्क है कि इतने कम समय में लगभग 14,191 करोड़ रुपये के बकाये का भुगतान करने का आदेश देना संवैधानिक रूप से असंभव है.

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वित्त विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव द्वारा दायर ‘स्पेशल लीव पिटिशन’ में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के 3 अगस्त के फैसले को चुनौती दी गई है. हाईकोर्ट ने राज्य में कार्यरत ‘ऑल इंडिया सर्विसेज’ के अधिकारियों पर लागू दरों के हिसाब से बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया था.

याचिका में कहा गया है कि लिक्विडेशन प्लान के तहत स्वीकार किए गए बकाया की रकम लगभग 14,191 करोड़ रुपये तय की गई थी, जिसका भुगतान पांच वित्तीय वर्षों में किया जाना था. इसमें कहा गया है कि विवादित फैसले के अनुसार पूरी रकम – जिसमें 42फीसदी और लगभग 60 फीसदी के बीच का पूरा अंतर भी शामिल है – दो हफ़्ते के अंदर चुकानी होगी.

इसमें बताया गया है कि सालाना सैलरी और पेंशन पर होने वाले लगभग 58,064.05 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान, वित्त वर्ष 2025-26) के खर्च के मुकाबले, सिर्फ मंजूर किए गए बकाया का ही आंकड़ा राज्य के कुल वेतन और पेंशन बिल के लगभग तीन महीने के बराबर है. और इस रकम का इंतजाम करके इसे चौदह दिनों के भीतर बांटना है.

राज्य की याचिका में कहा गया, ‘नियमों का पालन करना न सिर्फ मुश्किल है, बल्कि तय समय में ऐसा करना संवैधानिक रूप से असंभव है. अनुच्छेद 266(3) के तहत, संविधान में बताए गए तरीके के अलावा राज्य की संचित निधि (Consolidated Fund) से कोई भी पैसा नहीं निकाला जा सकता है, और वह तरीका अनुच्छेद 202 से 206 में दिया गया है.’

राज्य ने तर्क दिया कि इतने बड़े खर्च के लिए, जो मंजूर किए गए अनुमानों में शामिल नहीं है, अनुच्छेद 205(1)(a) के तहत एक सप्लीमेंट्री स्टेटमेंट की जरूरत होती है. साथ ही अनुच्छेद 203(3) के तहत ग्रांट की मांग, जो केवल गवर्नर की सिफ़ारिश पर ही की जा सकती है, अनुच्छेद 203(2) के तहत सदन की मंजूरी और अनुच्छेद 204 के तहत एक एप्रोप्रिएशन एक्ट की भी जरूरत होती है, जिसके बिना अनुच्छेद 204(3) के तहत कोई भी पैसा नहीं निकाला जा सकता.

इसमें कहा गया, ‘हर कदम के लिए विधानसभा की बैठक जरूरी है, जिसे अनुच्छेद 174 के तहत राज्यपाल को बुलाना ही होगा.’ याचिका में तर्क दिया गया कि इस निर्देश के कारण याचिकाकर्ता को चौदह दिनों के भीतर वह काम करने के लिए कहा जा रहा है, जिसकी इजाजत संविधान कार्यपालिका को विधायिका की पूर्व मंज़ूरी के बिना नहीं देता, और जिसके लिए विधायिका को मजबूर भी नहीं किया जा सकता.

अदालत ने कहा, ‘रिट कोर्ट न तो आर्टिकल 266(3) के अलावा किसी और तरीके से ‘कंसोलिडेटेड फंड’ से पैसे निकालने का निर्देश दे सकती है, और न ही संविधान में बताई गई विधायी प्रक्रिया के लिए अनुपालन की कोई समय-सीमा तय कर सकती है.’

राज्य की याचिका में कहा गया, ‘याचिकाकर्ता अपने कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को उस समानता से वंचित नहीं करना चाहता जिसके वे हकदार हैं. उसने शपथ के साथ और कानून में बताए गए पैमाने के अनुसार वह समानता देने की पेशकश की है. हालांकि, वह उस निर्देश को चुनौती देना चाहता है जो एक बिल्कुल अलग पैमाना तय करता है.

एक ऐसी दर पर जो केंद्र सरकार ने किसी दूसरे कानून के तहत किसी दूसरी सेवा के लिए तय की थी, जिसका भुगतान ब्याज सहित दो हफ़्ते में किया जाना है, और जो ऐसे तर्क पर आधारित है जो राज्य के उस अधिकार (जिसे राज्य ने कभी नहीं छोड़ा) को एक ऐसे कर्ज के तौर पर देखता है जिसे चुकाने से राज्य ने इनकार कर दिया है.’

हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पेमेंट न होने की स्थिति में राज्य को 6 प्रतिशत साधारण ब्याज देना होगा और बकाया राशि का भुगतान होने तक उसे ‘अनुत्पादक’ खर्च करने से रोक दिया. याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट के फैसले से दो अहम सवाल उठते हैं.

‘क्या राज्य कानूनन केंद्रीय दर पर महंगाई भत्ता देने के लिए बाध्य है? अनुच्छेद 309 के प्रावधान के तहत बनाए गए पंजाब सिविल सेवा (संशोधित वेतन) नियम, 2021, जो इस क्षेत्र में एकमात्र कानूनी दस्तावेज हैं, में ऐसा कहीं नहीं कहा गया है. वे कोई इंडेक्स, कोई फॉर्मूला, कोई दर और कोई अंतराल तय नहीं करते हैं’, इसमें कहा गया.

‘यह निचली दोनों अदालतों का एक जैसा निष्कर्ष है (08.04.2026 के फैसले का पैराग्राफ 44, विवादित फैसले के पैराग्राफ 48 और 86). राज्य जो भुगतान करता है, वह उसकी वित्तीय स्थिति पर निर्भर करता है और नियम जानबूझकर इसे उसी पर छोड़ देते हैं’, याचिका में आगे कहा गया.

‘अगर नियमों में ऐसा नहीं कहा गया है, तो क्या 17.06.2021 का मेमोरेंडम, 18.06.2021 को मंत्रिपरिषद की मंजूरी और 21.06.2021 का आंतरिक संचार उस कमी को पूरा कर सकते हैं जो नियमों में रह गई है? वे ऐसा नहीं कर सकते और अपनी भाषा के आधार पर ऐसा करने का दावा भी नहीं करते. तीनों दस्तावेजों में से किसी में भी यह नहीं कहा गया है कि पंजाब केंद्रीय दरों पर भुगतान करेगा’, राज्य की याचिका में कहा गया.

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