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Home » Blog » ग्लेशियर झीलों के खतरे पर कड़ा पहरा: उत्तराखंड के वसुंधरा ताल में शुरू हुआ देश का पहला अर्ली वार्निंग सिस्टम
उत्तराखंडराज्य

ग्लेशियर झीलों के खतरे पर कड़ा पहरा: उत्तराखंड के वसुंधरा ताल में शुरू हुआ देश का पहला अर्ली वार्निंग सिस्टम

TRIPTY SRIVASTAVA
Last updated: September 30, 2026 7:23 am
TRIPTY SRIVASTAVA
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देहरादून: उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से होने वाली संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लाॅफ) के जोखिम को कम करने और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों की निगरानी के साथ ही पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में पहल शुरू हो गई है. चमोली जिले में स्थित वसुंधरा ताल से प्रदेश में ग्लेशियल झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की शुरुआत की जा रही है. इसके लिए मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने मंगलवार को सचिवालय से वसुंधरा ताल में निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए जा रहे वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया.

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उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को ओर से राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत ये अभियान संचालित किया जा रहा है. अभियान दल में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की के 12 सदस्य और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के 2 वैज्ञानिक शामिल है। उच्च हिमालयी एवं दुर्गम क्षेत्र में अभियान दल की सुरक्षा, आवागमन और फील्ड सहयोग के लिए राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवान भी दल के साथ रहेंगे.

यूएसडीएमए की ओर से अभियान के लिए आवश्यक समन्वय एवं लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराई गई है. टीम को सेटेलाइट फोन के साथ ही लो अर्थ आर्बिट डिवाइस को यूएसडीएमए की ओर से उपलब्ध कराई गई है. जिससे टीम का संचार व समन्वय बना रहे. इस सिस्टम के जरिए वसुंधरा ताल एवं उसके आसपास के पर्यावरणीय और जलवैज्ञानिक परिवर्तनों की लगातार निगरानी की जा सकेगी. सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर संभावित असामान्य परिवर्तनों की पहचान करने और समय रहते संबंधित तंत्र को अलर्ट उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी.

इन उपकरणों से होगी वसुंधरा ताल की निगरानी
  • जलस्तर सेंसर-झील के जलस्तर में उतार-चढ़ाव एवं असामान्य परिवर्तनों की निगरानी.
  • स्वचालित मौसम केंद्र-तापमान, आर्द्रता, वर्षा, हवा की गति एवं दिशा, वायुदाब तथा प्रकाश की तीव्रता का मापन
  • स्नो डेप्त सेंसर-झील के आसपास बर्फ की गहराई में होने वाले बदलावों की निगरानी.
  • स्नो सब सरफेस टेंपरेचर सेंसर-बर्फ की विभिन्न गहराइयों पर तापमान में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए आठ सेंसर.
  • टिल्ट एवं एक्सेलेरोमीटर सेंसर-चयनित स्थानों पर झुकाव, कंपन एवं हलचल की निगरानी.
  • जल प्रवाह सेंसर-जल प्रवाह में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी.
  • सौर ऊर्जा प्रणाली-दुर्गम उच्च हिमालयी क्षेत्र में उपकरणों को विद्युत आपूर्ति.
  • उपग्रह संचार प्रणाली-मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में आंकड़ों को बेस स्टेशन तक भेजने की व्यवस्था.
  • डेटा लॉगर एवं मॉनिटरिंग डैशबोर्ड-प्राप्त आंकड़ों का रिकॉर्ड, ऑनलाइन प्रदर्शन तथा निर्धारित थ्रेशोल्ड के आधार पर अलर्ट जनरेशन।

सीबीआरआई रुड़की के निदेशक प्रो प्रदीप कुमार रमनचारला ने कहा-

जो इंस्ट्रूमेंट लगाने के लिए टीम रवाना हुई है वह इंस्ट्रूमेंट ग्लेशियर झील के वाटर लेवल का मेजरमेंट करेगा, स्नो डेप्थ और स्नो कर को मेजर करेगा, इसके साथ ही स्लो अर्थक्वेक को भी मेजर करेगा. इंस्ट्रूमेंट के लिए देहरादून में जो डाटा सेंटर बनाया जाएगा वहां इंस्ट्रूमेंट के जरिए जानकारी आती रहेगी. इसकी पूरी रियल टाइम मॉनिटरिंग हो पाएगी.

उन्होंने बताया वसुंधरा ताल के समीप करीब आठ तरह के सेंसर लगाए जाएंगे. लिहाजा सेंसर तो सेंसर कम्युनिकेशन होगा. सैटलाइट कम्युनिकेशन के जरिए जानकारी उनको उपलब्ध होगी. ये इंस्ट्रूमेंट सीबीआरआई रुड़की की ओर से तैयार किया गया है. करीब 6 महीने पहले इस इंस्ट्रूमेंट का ट्रायल डुंडी स्टेशन में किया जा चुका है. जहां से बेहतर रिस्पांस मिला है. जिसको देखते हुए वसुंधरा ताल में भी इन सभी इंस्ट्रूमेंट को लगा करके ट्रायल किया जा रहा है. लिहाजा अगर अगले 6 महीने में बेहतर इनफॉरमेशन मिलती है तो फिर इसको बढ़ाए जाने पर विचार किया जा सकता है. उन्होंने बताया ये इंस्ट्रूमेंट -40 से +50 डिग्री सेल्सियल तापमान पर भी काम करेगा.

मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने कहा-

वसुंधारा ताल में इंस्ट्रूमेंट और सेंसर लगाए जाने को लेकर टीम रवाना हो गई है. ये इंस्ट्रूमेंट और सेंसर मेजरमेंट करने के साथ कंट्रोल रूम में जानकारी उपलब्ध कराएगा. ट्रायल बेस पर यह काम किया जा रहा है. उत्तराखण्ड में ग्लेशियल झीलों की स्थिति और संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लाॅफ) के जोखिम को लेकर राज्य सरकार की ओर से लगातार निगरानी एवं वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है. राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) के साल 2023 के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में कुल 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित की गई हैं. इसके साथ ही राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने 13 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में चिन्हित किया गया है. इनमें बागेश्वर की 1, चमोली की 4, पिथौरागढ़ की 6, टिहरी गढ़वाल की 1 तथा उत्तरकाशी की 1 झील शामिल है.

आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने कहा-

इन उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक एवं तकनीकी जांच के तहत 6 झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है. चमोली जिले की सरस्वती ताल एवं वसुंधरा ताल, उत्तरकाशी जिले की केदारताल और पिथौरागढ़ जिले की दारमा घाटी स्थित मबांग, प्यूनग्रू एवं स्युंक्ति यांक्ति प्रोग्लेशियल झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण पूरा कर लिया गया है. सर्वेक्षण के जरिए से झीलों की गहराई, जलधारण क्षमता और अन्य महत्वपूर्ण जलवैज्ञानिक आंकड़े जुटाए गए हैं. जिनके आधार पर संभावित ग्लाॅफ जोखिम का वैज्ञानिक आकलन एवं आवश्यक आपदा प्रबंधन तैयारियों को और मजबूत किया जाएगा.

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