भोपाल: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर अड़े 19 विपक्षी दलों के डेमोक्रेसी मार्च और राहुल गांधी के प्रदर्शन को लेकर केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बार-बार जिनको जनता ने हराया है, उनको तो आत्मचिंतन करना चाहिए, लेकिन हार-हार के, हार-हार के इतने कुंठित हो गए हैं कि अब धमकी देने पर उतर आए हैं. अमार्यादित आचरण कर रहे हैं. शिवराज ने कहा कि जीतें तो जनादेश, हारें तो मशीन और सूची में खोट? ये नहीं चलेगा.
शिवराज का सवाल, फर्जी वोटों से कांग्रेस को इतनी मोहब्बत क्यों
न्यूज एजेंसी से बात करते हुए शिवराज सिंह ने कहा कि “सत्ता में रहते हुए जिन्होंने देश को लगातार लूटा है, वह चोरी की बात कर रहे हैं. लोकतंत्र में विरोध की भी मर्यादा होती है और विशेषकर जब कोई नेता प्रतिपक्ष जैसे पद पर हो. राहुल गांधी खीज कुंठा में बदल रही है और संतुलन बिगड़ रहा है. हर किसी को धमकियां दी जा रही हैं, डराया जा रहा है. धमकियों से काम नहीं चलेगा. यह समझो कि बीजेपी क्यों जीतती है, कांग्रेस क्यों हारती है.
अगर नरेंद्र मोदी जनता के दिलों में हैं, तो धमकी देकर आप जनता के दिलों से ना तो मोदी को, ना बीजेपी को, ना एनडीए को निकाल सकते हैं. उसके लिए तो जनता के बीच जा के मेहनत करनी पड़ेगी, लेकिन हारने के बाद संवैधानिक संस्थाओं को दोष देना. मैं पूछना चाहता हूं कि फर्जी वोटों से कांग्रेस को इतनी मोहब्बत क्यों है? उन्होंने सवाल किया कि क्या उनको पता है कि फर्जी वोट रहेंगे तो ही कांग्रेस की राजनीति बचेगी, कांग्रेस बचेगी?
इसलिए फर्जी बचाने की कोशिश की जा रही है. मैं फिर कहता हूं कि शुद्ध वोटर लिस्ट लोकतंत्र की आत्मा है और लोकतंत्र की पवित्रता के लिए जरूरी है कि वोटर लिस्ट शुद्ध हो, लेकिन जब शुद्धिकरण का काम होता है, तो कांग्रेस आपा खो देती है. आपा न खोए, आकाशवाणी में न बैठे, अकेले में जाए, चिंतन करे और सोचे, तब हार का सही कारण पता चलेगा.
शिवराज ने कहा सुधार का रास्ता आगे जाता है पीछे नहीं
इन्हें लोकतंत्र की चिंता नहीं है, हार की खीज है और जनादेश का अपमान करना है. देश को बैलेट पेपर के जमाने में वापस ले चलो, ये मांग कर रहे हैं. मशीन चलेगी, न मतदाता सूची की सफ़ाई ड़गे जी की तीन ‘नॉन-नेगोशिएबल’ मांगें, जरा आप सुनिए… ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा, SIR को रद्द करना और बैलट पेपर पर चुनाव कराना. मतलब वही दौर, जब 80-90 के दशक में बिहार और यूपी में मतपेटियां लूटी जाती थीं, दूसरों के नाम पर वोट पड़ते थे. उसी दौर को वापस लाना है?
फर्जी वोट रोकने के लिए चुनाव व्यवस्था में लगातार सुधार हुए हैं. EVM ने बूथ लूट पर लगाम लगाई और फोटो वोटर आईडी व सूची की जांच ने फर्जी मतदाताओं पर रोक. एसआईआर भी सुधार की इसी कड़ी का हिस्सा है. मृत, डुप्लिकेट और जगह छोड़ चुके नाम सूची से हटें. जब सूची ही साफ़ नहीं होगी, तो साफ़ चुनाव कैसे होगा और SIR रद्द करने की मांग का मतलब क्या है, कि गड़बड़ सूची पर ही चुनाव होते रहें? तेलंगाना, हिमाचल और झारखंड में सरकारें बनीं. जीतें तो जनादेश, हारें तो मशीन और सूची में खोट? यह दोहरा रवैया नहीं तो क्या है?सुधार का रास्ता आगे जाता है, पीछे नहीं. जनादेश का सम्मान कीजिए, सुधार का विरोध नहीं.
