नोएडा संवाददाता : प्रमोद दीक्षित
गाजियाबाद। गाजियाबाद संभागीय परिवहन कार्यालय (RTO) में ड्राइविंग लाइसेंस के लिए जारी किए जा रहे मेडिकल प्रमाणपत्रों को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। कार्यालय परिसर में कथित रूप से वर्षों से चल रही एक व्यवस्था पर शिकायतकर्ताओं ने फर्जीवाड़े और अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह मामला न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता बल्कि सड़क सुरक्षा और सार्वजनिक विश्वास से भी जुड़ा एक गंभीर विषय बन सकता है।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि आरटीओ कार्यालय के कक्ष संख्या-102 में धनीराम नामक व्यक्ति लंबे समय से मेडिकल प्रमाणपत्रों से संबंधित कार्य कर रहा है। आरोप यह भी है कि उसकी कोई अधिकृत सरकारी नियुक्ति नहीं है, इसके बावजूद वह वर्षों से कार्यालय परिसर में बैठकर ड्राइविंग लाइसेंस आवेदकों के मेडिकल दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है।
सरकारी चिकित्सक के नाम के उपयोग का आरोप
मामले को लेकर सबसे गंभीर आरोप यह है कि गाजियाबाद के एक सरकारी अस्पताल में कार्यरत डॉ. आलोक रंजन के नाम और पहचान का कथित रूप से उपयोग करते हुए बड़ी संख्या में मेडिकल प्रमाणपत्र जारी किए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि प्रतिदिन अनेक आवेदकों के मेडिकल प्रमाणपत्र इसी प्रक्रिया के माध्यम से तैयार किए जाते हैं।
यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं। क्या संबंधित चिकित्सक स्वयं इन प्रमाणपत्रों का परीक्षण और सत्यापन कर रहे हैं? क्या इस प्रक्रिया के लिए विभागीय अनुमति प्राप्त है? और यदि नहीं, तो इतने लंबे समय तक यह व्यवस्था बिना किसी प्रशासनिक हस्तक्षेप के कैसे संचालित होती रही?
वर्षों से कार्रवाई नहीं होने का आरोप
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस संबंध में परिवहन विभाग एवं जिला प्रशासन को कई बार अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई सामने नहीं आई। उनका आरोप है कि एक संवेदनशील सरकारी प्रक्रिया में कथित अनधिकृत व्यक्ति की भूमिका प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
हालांकि, इन दावों पर अभी तक परिवहन विभाग की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि या स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।
ड्राइविंग लाइसेंस नवीनीकरण से जुड़ा मामला भी चर्चा में
विवाद उस समय और गहरा गया जब आवेदन संख्या 1535560926 से जुड़े एक ड्राइविंग लाइसेंस नवीनीकरण प्रकरण का उल्लेख सामने आया। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मसलुद्दीन खान नामक आवेदक का मेडिकल प्रमाणपत्र फिट घोषित कर जारी कर दिया गया, जबकि शिकायत के अनुसार उसे दृष्टि संबंधी गंभीर समस्या थी।
हालांकि, इस विशेष मामले की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। न तो संबंधित चिकित्सक और न ही परिवहन विभाग की ओर से इस प्रकरण पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। इसलिए इस दावे की सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
सड़क सुरक्षा पर भी उठ रहे सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में मेडिकल परीक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण चरण होता है। यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता या फर्जी प्रमाणपत्र जारी होने की पुष्टि होती है, तो ऐसे व्यक्ति भी वाहन चलाने की अनुमति प्राप्त कर सकते हैं जो निर्धारित चिकित्सकीय मानकों को पूरा नहीं करते। इससे सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है और आम नागरिकों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
इसी कारण मेडिकल प्रमाणपत्रों की पारदर्शिता और सत्यता सुनिश्चित करना परिवहन विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी मानी जाती है।
निष्पक्ष जांच की मांग
शिकायतकर्ताओं ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आरोप गलत हैं तो संबंधित व्यक्तियों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाए, और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जाए।
फिलहाल परिवहन विभाग, जिला प्रशासन तथा संबंधित अधिकारियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और इस पूरे प्रकरण की वास्तविक जिम्मेदारी किस पर बनती है।
(नोट: यह समाचार उपलब्ध शिकायतों और आरोपों के आधार पर तैयार किया गया है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है तथा संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर समाचार को अद्यतन किया जाएगा।)
