नई दिल्ली। सन 1995 में एम्स के पास ऋषि सेठी नाम के कारोबारी को गन प्वाइंट पर अपहरण करने के मामले में उम्रकैद की सजा पाए भगोड़े सजायाफ्ता अमित यादव को क्राइम ब्रांच ने देहरादून से गिरफ्तार कर लिया है। बदमाशों ने कारोबारी के स्वजन से एक करोड़ फिरौती मांगी थी।
फिरौती की 10 लाख रकम लेते हुए दिल्ली पुलिस ने अमित यादव को मेरठ के एक होटल से दबोच लिया था। सन 2000 में दिल्ली हाई कोर्ट से इसे एक महीने की अंतरिम जमानत मिली थी, उसके बाद 26 साल से वह फरार था। फिंगरप्रिंट ब्यूरो और क्राइम रिकॉर्ड ऑफिस की मदद से 31 साल पुराने बायोमेट्रिक डाटा से पहचान कर लंबे समय बाद सजायाफ्ता को दबोचने में कामयाबी मिली।
क्या है पूरा मामला?
विशेष आयुक्त क्राइम ब्रांच एचएस धालीवाल के मुताबिक अमित यादव, बागपत का रहने वाला है। डीसीपी संजीव कुमार यादव के नेतृत्व में एसीपी संजय नागपाल व इंस्पेक्टर रोबिन त्यागी की टीम ने कई माह तक जांच के बाद कामयाबी मिली। 12 सितंबर 1995 को एम्स के डायरेक्टर के आवास के पास कार में बैठे कारोबारी ऋषि सेठी को चार बदमाशों ने अपहरण कर लिया था।
अपहरण करने के दौरान उनके साथ मारपीट की गई और आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हीं की कार में अपहरण कर लिया गया। अगले दिन बदमाशों ने पीड़ित के परिवार से एक करोड़ फिरौती मांगी थी। डील के मुताबिक, बदमाशों के कहने पर 10 लाख रुपये मेरठ के होटल मयूर (कमरा नंबर 221) में मंगवाया गया।
16 सितंबर को जैसे ही अमित यादव फिरौती की रकम लेने पहुंचा, पुलिस ने उसे दबोच लिया था। अमित की निशानदेही पर पुलिस ने गाजियाबाद के राज नगर स्थित उसके किराए के मकान पर छापा मार वहां से कारोबारी को मुक्त करा लिया था। उन्हें स्टोर रूम के भीतर जंजीरों से बांधकर रखा गया था।
मौके से ताले, चाबियां, पट्टियां और अन्य अहम सुबूत बरामद किए थे। पटियाला हाउस कोर्ट ने 25 अगस्त 1999 को अमित को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 2.50 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। दिसंबर 2000 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उसकी अपील खारिज करते हुए सजा बरकरार रखी।
26 साल से फरार चल रहे अमित यादव को पकड़ना क्राइम ब्रांच के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था। इतने सालों में ना तो जेल प्रशासन के पास उसकी कोई फोटो बची थी और ना ही दिल्ली पुलिस के पास। इस केस को सुलझाने में फिंगरप्रिंट ब्यूरो के डायरेक्टर सुभाष चंदर और क्राइम रिकार्ड आफिस के इंस्पेक्टर ब्रह्म प्रकाश की भूमिका निर्णायक रही।
क्राइम ब्रांच की टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद 1999 में सजा के वक्त रिकार्ड किए गए अमित यादव के बायोमेट्रिक व फिंगरप्रिंट डाटा को खोज निकाला। इसी फिंगरप्रिंट रिकार्ड से अमित की पहचान पुख्ता हो सकी।
बेच दी थी पैतृक संपत्ति
पूछताछ में अमित यादव ने बताया कि 2000 में फरार होने के बाद उसने गाजियाबाद का मकान छोड़ दिया और दिल्ली पुलिस के रिकार्ड में दर्ज अपने सभी संपर्क खत्म कर दिए। यहां तक कि उसने बागपत स्थित अपने पैतृक गांव सैदपुर की जमीन-जायदाद तक बेच दी।
शुरुआत में वह ऋषिकेश में ठिकाने बदल-बदल कर छिपा रहा। इसके बाद 2001 में वह देहरादून शिफ्ट हो गया, जहां उसने फर्जी दस्तावेज के आधार पर अपनी पहचान बदली और कंस्ट्रक्शन के धंधे में उतर गया। इतने सालों में वह देहरादून में एक स्थापित बिल्डर बन चुका था और नया जीवन जी रहा था।

