गाजियाबाद। जिले की करीब 50 लाख आबादी के लिए सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में एक भी न्यूरोलाजी विशेषज्ञ (न्यूरोलाजिस्ट) उपलब्ध नहीं है। ऐसे में मस्तिष्क संबंधी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को उपचार के लिए निजी अस्पतालों या दिल्ली के बड़े सरकारी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।
इससे इलाज में देरी होने के साथ आर्थिक बोझ भी बढ़ जाता है। जिले में माइग्रेन, मिर्गी, स्ट्रोक, पार्किंसन, डिमेंशिया, नसों की बीमारियां और अन्य न्यूरोलाजिकल विकार से संबंधित तीन लाख से अधिक लोग मरीज हैं।
जिला अस्पताल में प्रतिदिन पहुंचते हैं 100 से अधिक मरीज
जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में प्रतिदिन 100 से अधिक मरीज परामर्श के लिए पहुंचते हैं। चिकित्सकों के अनुसार इनमें लगभग 20 प्रतिशत मरीज ऐसे होते हैं, जिनकी समस्या मस्तिष्क संबंधी होती है।
इन मरीजों को न्यूरोलाजिस्ट की जरूरत होती है, लेकिन विशेषज्ञ नहीं होने के कारण उन्हें रेफर करना पड़ता है। भारत में विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, आबादी का लगभग आठ से 10 प्रतिशत किसी न किसी प्रकार के न्यूरोलरजिकल (मस्तिष्क एवं तंत्रिका तंत्र) विकार से प्रभावित हो सकता है।
इस आधार पर 50 लाख की आबादी वाले गाजियाबाद में अनुमानित तीन लाख से अधिक लोग किसी न किसी प्रकार की मस्तिष्क या तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्या से प्रभावित होने का अनुमान है। मस्तिष्क संबंधी रोगों की पहचान मरीज के लक्षणों और चिकित्सकीय परीक्षण से की जाती है। आवश्यकता पड़ने पर डाक्टर एमआरआइ, सीटी स्कैन, ईईजी, ईएमजी, नर्व कंडक्शन स्टडी, रक्त जांच सहित अन्य अन्य जांच कराता है।
विशेषज्ञ नहीं होने से बढ़ रही परेशानी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्ट्रोक जैसी बीमारी में ‘गोल्डन आवर’ के भीतर इलाज मिलना बेहद जरूरी होता है। जिले में न्यूरोलाजिस्ट नहीं होने से मरीजों को दूसरे शहरों में रेफर करना पड़ता है, जिससे उपचार में देरी हो सकती है और गंभीर मामलों में स्थायी विकलांगता या मृत्यु का खतरा भी बढ़ जाता है।
मरीज को समय पर इलाज मिलने पर उसके ठीक हो जाता है। यदि सिरदर्द, बेहोशी, शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी, बोलने में परेशानी या याददाश्त में लगातार गिरावट जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
मस्तिष्क रोग के प्रमुख लक्षण
- बार-बार या लगातार तेज सिरदर्द।
शरीर के किसी हिस्से में अचानक कमजोरी या सुन्नपन।
बोलने या समझने में कठिनाई।
चक्कर आना और संतुलन बिगड़ना।
बार-बार बेहोशी या मिर्गी के दौरे पड़ना।
याददाश्त कमजोर होना या भूलने की समस्या।
हाथ-पैरों में कंपन या चलने में परेशानी।
दृष्टि धुंधली होना या अचानक दिखाई देना कम होना।

